उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले से ‘कत्सेली कानून’ के तहत ऋण राहत की उम्मीद कर रहे उधारकर्ताओं को झटका लगा है। सरकारी सांसदों ने भी इस फैसले पर निराशा व्यक्त की है। यह कानून दिवालियापन से जूझ रहे व्यक्तियों को ऋण पुनर्गठन का अवसर प्रदान करता था। न्यायालय के फैसले का अर्थ है कि उधारकर्ताओं के लिए कानूनी सुरक्षा कम हो गई है। इस फैसले से उन लोगों पर असर पड़ेगा जो वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं और ऋणों का पुनर्गठन करने की उम्मीद कर रहे थे। सरकार इस फैसले के निहितार्थों का मूल्यांकन कर रही है और आगे की कार्रवाई पर विचार कर सकती है। यह मामला उधारकर्ताओं और बैंकों के बीच वित्तीय विवादों से जुड़ा है।
