लिथुआनिया में नाटो के पूर्वी मोर्चे को मजबूत करने के लिए जर्मन सेना की तैनाती की जा रही है। यह तैनाती रूस के संभावित खतरे के मद्देनज़र की जा रही है। हालांकि, सेना के अभ्यास का स्थान एक ऐसा जंगल है जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदी प्रतिरोध सेनानियों ने हिटलर के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। लिथुआनिया में, इन प्रतिरोध सेनानियों को अब भी राज्य के दुश्मनों के रूप में देखा जाता है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने विवाद पैदा कर दिया है, क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि अभ्यास स्थल का चुनाव असंवेदनशील है। यह मुद्दा नाटो और लिथुआनिया के बीच संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है। जर्मन सेना इस स्थिति से अवगत है और स्थानीय अधिकारियों के साथ संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रही है। यह घटना नाटो की पूर्वी यूरोप में सैन्य उपस्थिति और ऐतिहासिक स्मृति के बीच जटिल संबंधों को उजागर करती है।
