जर्मन टेलीविजन चैनलों ZDF और ARD पर चल रहे गर्मी के साक्षात्कारों पर टिप्पणी करते हुए, यह लेख राजनीतिक विश्लेषक बार्बेल बास और मार्कस सोडर के साक्षात्कारों की आलोचना करता है। लेखक का तर्क है कि ये साक्षात्कार राजनीतिक रूप से महत्वहीन मुद्दों पर केंद्रित हैं और किसी भी सार्थक संवाद में योगदान नहीं करते हैं। उनका प्रश्न है कि यदि चैनलों के पास और कुछ नहीं है तो वे सीधे टॉक शो क्यों नहीं चलाते हैं। यह सुझाव दिया गया है कि गर्मी के महीनों में ये साक्षात्कार केवल समय बर्बाद करने वाले हैं। लेख में मीडिया द्वारा जनता को सार्थक सामग्री प्रदान करने में विफलता पर प्रकाश डाला गया है। कुल मिलाकर, यह लेख गर्मियों के साक्षात्कारों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाता है और बेहतर प्रोग्रामिंग की मांग करता है।