आगामी फुटबॉल विश्व कप से पहले जर्मन फुटबॉल संघ (डीएफबी) की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। संघ पर विश्व राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का कोई दबाव नहीं था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि उसने असहनीय परिस्थितियों का विरोध करने का भी प्रयास नहीं किया। यह मौन कई लोगों को निराशाजनक लग रहा है और इसे नैतिक विफलता के रूप में देखा जा रहा है। डीएफबी की इस निष्क्रियता ने मानवाधिकारों और खेल की नैतिकता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस छेड़ दी है। विश्लेषकों का मानना है कि संघ को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी और स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति व्यक्त करनी चाहिए थी। इस मामले ने खेल जगत में डीएफबी की छवि पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। भविष्य में, संघ को इस तरह की स्थितियों में अधिक सक्रिय और मुखर रहने की उम्मीद है।