यह संस्मरण लेखक के पिता के व्यक्तित्व और उनकी आदतों पर केंद्रित है। लेखक बताते हैं कि उनके पिता पান্তा भात नहीं खाते थे, लेकिन ऐसे पारंपरिक आयोजनों का भरपूर आनंद लेते थे। उनके चेहरे पर हमेशा एक विशेष शांति और संतोष झलकता था। पिता का स्वभाव अत्यंत व्यवस्थित और अनुशासित था, जिसमें हर कार्य के प्रति उनकी सजगता दिखती थी। वे स्वच्छता और संयम को अपने जीवन में अत्यधिक महत्व देते थे। किसी भी विशेष अवसर पर वे सुंदर वस्त्र पहनना और इत्र लगाना पसंद करते थे। उनके लिए भोजन का आनंद केवल स्वाद में नहीं, बल्कि परिवार के साथ मिलकर समय बिताने में था।