धार्मिक नेता और आम लोग अक्सर यीशु मसीह के उपदेशों और उनके अनुयायियों के प्रति नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। यह विरोध सदियों से चला आ रहा है और इसके कई कारण हैं, जिनमें धार्मिक मान्यताओं में टकराव, सामाजिक मानदंडों को चुनौती देना और शक्ति संरचनाओं को खतरा महसूस होना शामिल है। कुछ लोगों को यीशु की शिक्षाएँ उनकी व्यक्तिगत जीवनशैली या विश्वदृष्टि के साथ असंगत लगती हैं। ऐतिहासिक रूप से, यीशु को अक्सर मौजूदा धार्मिक व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में देखा गया है। वर्तमान समय में भी, यीशु के अनुयायियों को भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ ईसाई धर्म अल्पसंख्यक है। यह लेख इस विरोध के कारणों और इसके परिणामों की पड़ताल करता है।
