यूरोप को पिछले पचास वर्षों से लगातार चेतावनियाँ मिल रही थीं, लेकिन उसने उन पर ध्यान नहीं दिया। यह निष्क्रियता अब वैश्विक शक्तियों और तेल उत्पादक देशों के प्रभाव में आने का कारण बन रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यूरोप अपनी रणनीतिक स्वायत्तता खो रहा है। यह स्थिति यूरोपीय संघ की नीतियों और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं पर बाहरी दबाव के कारण उत्पन्न हुई है। ऊर्जा निर्भरता और भू-राजनीतिक हितों के टकराव ने यूरोप को कमजोर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप को अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एक मजबूत और एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। वर्तमान स्थिति में, यूरोप बाहरी ताकतों के हितों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है।
