संस्कृति को केवल प्रचार अभियानों में शामिल करने की बजाय, उसे नीतिगत निर्णयों में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। यह विचार इस बात पर ज़ोर देता है कि संस्कृति को संसाधनों के आवंटन, क्षेत्रीय विकास और राज्य निर्माण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रभाव डालना आवश्यक है। संस्कृति को अपनी आवाज़ उठानी होगी और नीति निर्माताओं को प्रभावित करना होगा। यह निष्क्रिय भूमिका से आगे बढ़कर सक्रिय भागीदारी की वकालत करता है। 'ला सिल्ला वाकिया' में प्रकाशित एक लेख में इस मुद्दे को उठाया गया है, जिसमें संस्कृति के महत्व को रेखांकित किया गया है। लेख में तर्क दिया गया है कि संस्कृति को केवल एक प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए जो विकास और शासन को आकार दे सकती है। यह संस्कृति के क्षेत्र के लिए अधिक स्वायत्तता और प्रभाव की मांग करता है।
