यह लेख सांस्कृतिक विविधता के विरुद्ध चलाए जा रहे संघर्षों पर चर्चा करता है। इसमें "सांस्कृतिक युद्ध" के नारे लगाने वालों की आलोचना की गई है। लेखक का तर्क है कि समाज से भेदभाव और हिंसा का शिकार लोगों को हटाने का प्रयास पूरी तरह गलत है। इस तरह की मानसिकता लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है। लेख के अनुसार, विविधता को मिटाने की कोशिशें समाज में विभाजन पैदा करती हैं। यह संदेश देता है कि समानता और समावेशिता ही एक स्वस्थ समाज की पहचान है। अंततः, यह लेख मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने की अपील करता है।