आधुनिक दंत चिकित्सा में अब प्राकृतिक मुस्कान को ही विलासिता माना जा रहा है। हाल के शोध बताते हैं कि मस्तिष्क आसानी से कृत्रिम मुस्कानों को पहचान लेता है, भले ही वे दिखने में एकदम सही लगें। ऐसा इसलिए है क्योंकि मस्तिष्क सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्तियों को अधिक महत्व देता है। कृत्रिम मुस्कानें अक्सर अस्वाभाविक और बेईमान प्रतीत होती हैं, इसलिए मस्तिष्क उन्हें अस्वीकार कर देता है। दंत चिकित्सक अब ऐसे परिणाम प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो न केवल सौंदर्यपूर्ण हों, बल्कि प्राकृतिक भी दिखें। यह प्रवृत्ति इस बात को दर्शाती है कि प्रामाणिकता और वास्तविकता को अब सौंदर्य मानकों में अधिक महत्व दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वाभाविक मुस्कानें अधिक आकर्षक और विश्वसनीय होती हैं।