आरश खान जुलाई २०२४ के जन-अभ्युत्थान के दौरान सड़कों पर उतरे थे। हालांकि वह उस आंदोलन से जुड़े हुए थे, लेकिन वह खुद को ‘जुलाई योद्धा’ कहलाना पसंद नहीं करते। उनका मानना है कि सब कुछ पीछे छूट गया है, और सबसे महत्वपूर्ण चीज़—इंसानियत—को हम भूल गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी विशेष पहचान से बंधे रहना नहीं चाहते। उनका अनुभव दर्शाता है कि आंदोलनों में भाग लेने वाले हर व्यक्ति की अपनी व्यक्तिगत यात्रा और भावनाएं होती हैं। आरश खान का दृष्टिकोण हमें याद दिलाता है कि किसी भी संघर्ष के केंद्र में हमेशा इंसानियत होनी चाहिए। वह चाहते हैं कि लोग उस मूलभूत सत्य को याद रखें।