विशेषज्ञ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग को बहस और चर्चा मंचों में अनुचित मानते हैं, इसे एक तरह की 'धोखाधड़ी' के समान बताते हैं। उनका तर्क है कि AI का उपयोग करने से व्यक्ति की आलोचनात्मक सोच, सहानुभूति और रचनात्मकता जैसे महत्वपूर्ण कौशल विकसित नहीं हो पाते। डेनिश विशेषज्ञ आंद्रेअस बिरगर जोहानसेन के अनुसार, AI द्वारा उत्पन्न सामग्री पर निर्भरता सार्वजनिक बहस की गुणवत्ता को कम कर सकती है। इसलिए, AI के उपयोग को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की वकालत की जा रही है ताकि बहस की निष्पक्षता और गहराई बनी रहे। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बहस में शामिल लोग स्वयं सोचें और लिखें, न कि AI पर निर्भर रहें। AI के उपयोग पर विनियमन बहस के सामाजिक महत्व को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।